उस की नफ़रत भी अमीक़ उस की मोहब्बत भी अमीक़
क़हर भी उस का है अल्लाह के बंदों पे शफ़ीक़
परवरिश पाता है तक़लीद की तारीकी में
है मगर उस की तबीअत का तक़ाज़ा तख़लीक़
अंजुमन में भी मयस्सर रही ख़ल्वत उस को
शम्अ महफ़िल की तरह सब से जुदा सब का रफ़ीक़
मिस्ल ख़ुर्शीद फ़िक्र की ताबानी में
बात में सादा व आज़ादा मआनी में दक़ीक़
उस का अंदाज़ अपने ज़माने से जुदा
उस के अहवाल से महरम नहीं पीरान तरीक़
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा