खुल तो जाता है मग़नी के बम व ज़ेर से
!ना रहा ज़िंदा व पायनदा तो क्या की कशोद
है अभी सीना अफ़्लाक में पिन्हाँ वो नवा
जिस की गर्मी से पिघल जाए सितारों का वजूद
जिस की तासीर से आदम हो ग़म व ख़ौफ़ से पाक
और पैदा हो अईआज़ी से मक़ाम महमोद
मह व अंजुम का ये हैरत कदा बाक़ी न रहे
तो रहे और तिरा ज़मज़मा ला मौजूद
जिस को मशरो समझते हैं फ़क़ीहान ख़ुदी
!मनतज़र है किसी मुतरिब का अभी तक वो सरोद
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा