ऐ अहल ज़ौक़ नज़र ख़ूब है लेकिन
जो शय की हक़ीक़त को न देखे वो क्या
मक़्सूद हुनर सोज़ हयात अबदी है
ये एक नफ़स या दो नफ़स मिस्ल शरर क्या
जिस से दिल दरिया मतलातम नहीं होता
ऐ क़तरिया नीसां वो सदफ़ क्या वो गुहर क्या
शाइर की नवा हो कि मग़नी का नफ़स हो
जिस से चमन अफ़्सुर्दा हो वो बाद सहर क्या
बे मजज़ा दुनिया में उभरती नहीं क़ोमीं
!जो ज़र्ब कलीमी नहीं रखता वो हुनर क्या
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा