है मिरे सीना बे में अब क्या बाक़ी
लाआला मुर्दा व अफ़्सुर्दा व बे ज़ौक़ नुमूद
चश्म भी न पहचान सके गी मुझ को
कि अईआज़ी से दगरगों है मक़ाम महमोद
क्यूँ मुसलमाँ न ख़जिल हो तिरी सनगीनी से
कि ग़ुलामी से हुआ मिस्ल ज़जाज उस का वजूद
है तिरी शान के शायाँ असी मोमिन की नमाज़
जिस की तकबीर में हो मारका बूद व नबोद
अब कहाँ मेरे नफ़स में वो हरारत वो गुदाज़
बे तब व ताब दरूँ मेरी सलोह और दरोद
है मिरी बानग अज़ाँ में न बुलंदी न शिकवा
क्या गवारा है तुझे ऐसे मुसलमाँ का सुजूद
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा