उस बहस का कुछ फ़ैसला में कर नहीं सकता
गो ख़ूब समझता हूँ कि ये है वो क़नद
क्या फ़ाएदा कुछ कह के बनों और भी मतोब
पहले ही मुझ से हैं तहज़ीब के फ़रज़नद
उस राज़ को अवरत की बसीरत ही करे फ़ाश
मजबूर हैं मज़ोर हैं मर्दान ख़िरद मंद
क्या चीज़ है आराइश व क़ीमत में ज़ियादा
!आज़ादी नस्वां कि ज़मुर्रद का गलोबनद
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा