रुस्वा क्या उस दूर को जल्वत की हवस ने
रौशन है निगह आइना है मकदर
बढ़ जाता है जब ज़ौक़ अपनी हदों से
हो जाते हैं अफ़्कार परागनदा व अबतर
आग़ोश सदफ़ जिस के नसीबों में नहीं है
वो क़तरा नीसां कभी बनता नहीं गौहर
ख़ल्वत में ख़ुदी होती है ख़ोदगीर व लेकिन
ख़ल्वत नहीं अब देर व हरम में भी मयस्सर
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा