अस्र हाज़िर मुल्क अलमोत है तेरा जिस ने
क़बज़ की रूह तिरी दे के तुझे फ़िक्र मआश
लरज़ता है हरीफ़ाना कशाकश से तिरा
ज़िंदगी है खो देती है जब ज़ौक़ ख़राश
उस जुनूँ से तुझे तालीम ने बेगाना क्या
जो ये कहता था ख़िरद से कि बहाने न तराश
फ़ैज़ फ़ितरत ने तुझे दीदा शाहीं बख़्शा
जिस में रख दी है ग़ुलामी ने निगाह ख़फ़ाश
मदरसे ने तिरी आँखों से छुपाया जिन को
ख़ल्वत कोह व बयाबाँ में वो असरार हैं फ़ाश
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा