उस क़ौम को शमशीर की हाजत नहीं रहती
हो जिस के ज्वानों की ख़ुदी सूरत फ़ौलाद
नाचीज़ मह व पर्वीं तिरे आगे
वो आलम मजबूर है तो आलम आज़ाद
मौजों की तपिश क्या है फ़क़त ज़ौक़ तलब है
पिन्हाँ जो सदफ़ में है वो दौलत है दाद
शाहीं कभी पर्वाज़ से थक कर नहीं गिरता
पर दम है अगर तो तो नहीं ख़तरा अफ़ताद
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा