हो बंदा-ए आज़ाद अगर साहब अलहाम
है उस की निगह फ़िक्र व अमल के लिए महमीज़
उस के नफ़स गर्म की तासीर है ऐसी
हो जाती है ख़ाक चमनसतान शरर आमेज़
शाहीं की अदा होती है में नमोदार
किस दर्जा बदल जाते हैं मुर्ग़ान ख़ेज़
उस मर्द ख़ुद आगाह ख़ुदा मस्त की सोहबत
देती है गदाओं को शिकवा जम व परवेज़
महकोम के अलहाम से अल्लाह बचाए
ग़ारत गर अक़्वाम है वो सूरत चनगीज़
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा