कुछ और चीज़ है शायद तिरी मुसलमानी
तिरी में है एक फ़क़्र व रहबानी
सकों परस्ती राहब से फ़क़्र है बेज़ार
फ़क़ीर का है सफ़ीना हमेशा तूफ़ानी
पसंद रूह व बदन की है वा नुमूद उस को
कि है निहायत मोमिन ख़ुदी की उर्यानी
वजूद सीरफ़ी काएनात है उस का
उसे ख़बर है ये बाक़ी है और वो फ़ानी
असी से पूछ कि पेश है जो कुछ
जहाँ है या कि फ़क़त रंग व बू की तग़ीआनी
ये फ़क़्र मर्द मुसलमाँ ने खो दिया जब से
रही न दौलत सलमानी व सुलेमानी
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा