बताऊँ तुझ को मुसलमाँ की ज़िंदगी क्या है
ये है निहायत अंदेशा व कमाल जुनूँ
तुलू है सिफ़त आफ़्ताब उस का ग़ुरूब
!ईगाना और मिसाल ज़माना गोना गूँ
न उस में अस्र रवाँ की हया से बीज़ारी
न उस में अहद कुहन के व अफ़्सूँ
हक़ाएक़ अबदी पर असास है उस की
!ईह ज़िंदगी है नहीं है तिलिस्म अफ़लातों
अनासिर उस के हैं रूह अलक़दस का ज़ौक़
!जम का हुस्न तबीअत अरब का सोज़ दरूँ
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा