सब अपने बनाए हुए ज़िंदाँ में हैं महबोस
ख़ावर के स्वाबत हूँ कि अफ़रंग के सीआर
पीरान कलीसा हूँ कि शीख़ान हरम हूँ
ने जदत गुफ़्तार है ने जदत किरदार
हैं अहल सियासत के वही कहना व पेच
शाइर असी अफ़लास तख़ील में गिरफ़्तार
दुनिया को है उस महदी बरहक़ की ज़रूरत
हो जिस की ज़लज़ला आलम अफ़्कार
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा