फ़त्वी है शैख़ का ये ज़माना क़लम का है
दुनिया में अब रही नहीं तलवार कारगर
लेकिन जनाब शैख़ को मालूम क्या नहीं
मस्जिद में अब ये वज़ है बे सूद व बे असर
तेग़ व तफ़नग दस्त मुसलमाँ में है कहाँ
हो भी तो हैं मौत की लज़्ज़त से बे ख़बर
काफ़िर की मौत से भी लरज़ता हो जिस का
कहता है कौन उसे कि मुसलमाँ की मौत मर
तालीम उस को चाहिए तर्क जहाद की
दुनिया को जिस के पनजा ख़ूनीं से हो ख़तर
बातिल की फ़ाल व फ़र की हिफ़ाज़त के वास्ते
योरप ज़रा में डूब गया दोश ता कमर
हम पूछते हैं शैख़ कलीसा नवाज़ से
मशरिक़ में जंग शर है तो मग़रिब में भी है शर
हक़ से अगर ग़रज़ है तो ज़ीबा है क्या ये बात
!आसलाम का महासबा योरप से दरगज़र
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा