क़ुव्वत थी जहाँ में यही तोहीद कभी
आज क्या है इक मसियलह इल्म कलाम
रौशन उस ज़ो से अगर ज़ुल्मत किरदार न हो
ख़ुद मुसलमाँ से है पोशीदा मुसलमाँ का मक़ाम
में ने ऐ मीर सपह! तेरी सिपह देखी है
क़ल व अल्लाह की शमशीर से ख़ाली हैं नियाम
आह! उस राज़ से वाक़िफ़ है न मिला न फ़क़ीह
वहदत अफ़्कार की बे वहदत किरदार है ख़ाम
क़ौम क्या चीज़ है क़ोमों की अमामत क्या है
!आस को क्या समझें ये बीचारे दो रकत के इमाम
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा