अगरचे ज़र भी जहाँ में है क़ाज़ी अलहाजात
जो फ़क़्र से है मयस्सर तो नगरी से नहीं
अगर जवाँ हूँ मिरी क़ौम के जसोर व ग़ीवर
क़लनदरी मिरी कुछ कम सिकंदरी से नहीं
कुछ और है तो जिस को ख़ुद समझता है
ज़वाल बंदा मोमिन का बे ज़री से नहीं
अगर जहाँ में मिरा आश्कार हुआ
क़लनदरी से हुआ है तो नगरी से नहीं
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा