ख़ुदी का सर निहाँ ला इलाह अला अल्लाह
ख़ुदी है तेग़ फ़सां ला इलाह अला अल्लाह
ये दूर अपने बराहीम की तलाश में है
सनम कदा है जहाँ ला इलाह अला अल्लाह
क्या है तो ने मता ग़ुरूर का सौदा
फ़रेब सूद व ज़ियाँ ला इलाह अला अल्लाह
ये माल व दौलत दुनिया ये रिश्ता व पैवंद
बुतान वहम व गुमाँ ला इलाह अला अल्लाह
ख़िरद हुई है ज़मान व मकाँ की ज़नारी
न है ज़माँ न मकाँ ला इलाह अला अल्लाह
ये नग़्मा फ़स्ल व लाला का नहीं पाबंद
हो कि ख़िज़ाँ ला इलाह अला अल्लाह
अगरचे बुत हैं जमात की आस्तीनों में
मुझे है हुक्म अज़ाँ ला इलाह अला अल्लाह
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा