कहता था अज़ाज़ील ख़ुदावंद जहाँ से
!परकालह आतिश हुई आदम की कफ़
जाँ लाग़र व तन फ़रबा व मल्बूस बदन ज़ेब
!दल नज़्अ की हालत में ख़िरद पुख़्ता व चालाक
नापाक जिसे कहती थी मशरिक़ की शरीत
!मग़रब के फ़क़ीहों का ये फ़त्वी है कि है पाक
तुझ को नहीं मालूम कि होरान बहिश्ती
वीरानी जन्नत के तसव्वुर से हैं नाक
जम्हूर के इबलीस हैं अरबाब सियासत
!बाक़ी नहीं अब मेरी ज़रूरत तह अफ़्लाक
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा