बता क्या तिरी ज़िंदगी का है राज़
हज़ारों बरस से है तो बाज़
असी में दब गई तेरी आग
!सहर की अज़ाँ होगियी अब तो जाग
ज़मीं में है गो ख़ाकीवं की बरात
नहीं उस अँधेरे में आब हयात
ज़माने में झूटा है उस का नगीं
जो अपनी ख़ुदी को परखता नहीं
बुतान शवब व क़बायल को तोड़
रसोम कुहन के सलासिल को तोड़
यही दीन मोहकम यही फ़त्ह बाब
कि दुनिया में तोहीद हो बे हिजाब
बख़ाक बदन दानह दिल फ़िशाँ
कि अईं दाना दारदज़ हासिल निशाँ
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा