हम ख़ोगर महसूस हैं साहिल के ख़रीदार
इक बहर पर आशोब व पर असरार है रोमी
तो भी है असी क़ाफ़लह शौक़ में इक़बाल
जिस क़ाफ़लह शौक़ का सालार है रोमी
उस अस्र को भी उस ने दिया है कोई पैग़ाम
कहते हैं रह अहरार है रोमी
कि नबाईद ख़ोरद व जो हमचों ख़रां
आह्वाना दर ख़ुतन चर अरग़्वां
हर कि काह व जो ख़ोरद क़रबां शोद
हर कि हक़ ख़ोरद क़रां शोद
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा