शहीद मोहब्बत न काफ़िर न ग़ाज़ी
मोहब्बत की रस्में न तरकी न ताज़ी
वो कुछ और है मोहब्बत नहीं है
सखाती है जो ग़ज़न्वी को अईआज़ी
ये जौहर अगर कार फ़रमा नहीं है
तो हैं इल्म व हिकमत शीशा बाज़ी
न महताज सुल्ताँ न मरवब सुल्ताँ
मोहब्बत है आज़ादी व बे नियाज़ी
मिरा फ़क़्र बेहतर है असकनदरी से
ये आदम गरी है वो आईना साज़ी
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा