इक सितारों से कहा नजम सहर ने
आदम को भी देखा है किसी ने कभी बेदार
कहने लगा मरीख़ अदा फ़हम है तक़दीर
है नींद ही उस छोटे से फ़ित्ने को सज़ावार
ज़ोहरा ने कहा और कोई बात नहीं क्या
!आस करमक कोर से क्या हम को सरोकार
बोला मह कामिल कि वो कोकब है ज़मीनी
तुम शब को नमोदार हो वो दिन को नमोदार
वाक़िफ़ हो अगर लज़्ज़त बेदारी शब से
अवनची है सरीआ से भी ये ख़ाक पर असरार
आग़ोश में उस की वो तजल्ली है कि जिस में
खो जाएँ गे अफ़्लाक के सब साबित व सीआर
नागाह फ़ज़ा बानग अज़ाँ से हुई लबरेज़
!वा नरा कि हल जाता है जिस से दिल कोहसार
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा