कदे में एक दिन इक रिंद ज़ीरक ने कहा
है हमारे शहर का वाली गदा बे हया
ताज पहनाईआ है किस की बे कुलाही ने उसे
किस की उर्यानी ने बख़्शी है उसे ज़रीं क़बा
उस के आब गूँ की ख़ून दहक़ाँ से कशीद
तेरे मेरे खेत की मिट्टी है उस की कीमिया
उस के नेमत ख़ाने की हर चीज़ है मानगी हुई
देने वाला कौन है मर्द ग़रीब व बे नवा
माँगने वाला गदा है सदक़ा माँगे या ख़िराज
!कोयी माने या न माने मीरो सुल्ताँ सब गदा
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा