दरेग़ आमदम ज़ां हमा बोसतां
तही दस्त रफ़तन सू दोस्ताँ
क़ल्ब व की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँ
चशमा आफ़्ताब से की नदीआं रवाँ
हुस्न अज़ल की है नुमूद चाक है परदिया वजूद
दिल के लिए हज़ार सूद एक निगाह का ज़ियाँ
सुर्ख़ व कबोद बदलीआं छोड़ गया सहाब शब
कोह अज़म को दे गया रंग बरनग तीलसां
गर्द से पाक है हुआ बर्ग नख़ील धल गए
रेग न्वाह काज़मा नर्म है मिस्ल परनीआं
आग बुझी हुई अधर टूटी हुई तनाब अधर
क्या ख़बर उस मक़ाम से गुज़रे हैं कितने कारवाँ
आई सदा जिबरईल तेरा मक़ाम है यही
अहल फ़िराक़ के लिए ऐश दवाम है यही
किस से कहूँ कि ज़हर है मेरे लिए म ए हयात
कहना है बज़्म काएनात ताज़ा हैं मेरे वारदात
क्या नहीं और ग़ज़न्वी कारगा हयात में
बैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल हरम के सोमनात
ज़िक्र अरब के सोज़ में फ़िक्र अजम के साज़ में
ने अरबी मशाहदात ने अजमी तख़ीलात
क़ाफ़लह हिजाज़ में एक हसीन भी नहीं
गरचे है ताब दार अभी गेसू दजला व फ़रात
अक़्ल व दिल व निगाह का मुर्शिद अव्वलीं है इश्क़
इश्क़ न हो तो शरअ व दीं बुत कदिया तसोरात
सिद्क़ ख़लील भी है इश्क़ सब्र हसीन भी है इश्क़
मरकह वजूद में बदर व हनीन भी है इश्क़
आईह काएनात का मनी देर याब तो
निकले तिरी तलाश में क़ाफ़िला हाये रंग व बू
जलोतीआन मदरसा कोर निगाह व मुर्दा ज़ौक़
ख़लोतीआन मय कदा कम तलब व तही कदो
में कि मिरी ग़ज़ल में है आतिश रफ़्ता का सुराग़
मेरी तमाम सरगज़शत खोए हुओं की जुस्तुजू
बाद सबा की मौज से नशोवनमाये ख़ार व ख़स
मेरे नफ़स की मौज से नशोवनमाये आरज़ू
ख़ून दिल व जिगर से है मेरी नवा की परवरिश
है रग साज़ में रवाँ साहब साज़ का लहू
फ़ुर्सत कशमकश मदा अईं दिल बे क़रार रा
यक दो शिकन ज़ियादा किन गीस्वे ताबदार रा
लौह भी तो क़लम भी तो तेरा वजूद अलकताब
गुम्बद आबगीना रंग तेरे मुहीत में हबाब
आलम आब व ख़ाक में तेरे ज़ुहूर से फ़रोग़
ज़र्रा रेग को दिया तो ने तुलू आफ़्ताब
शौकत सनजर व सलीम तेरे जलाल की नुमूद
फ़क़्र जनीद व बाईज़ीद तेरा जमाल बे नक़ाब
शौक़ तिरा अगर न हो मेरी नमाज़ का इमाम
मेरा क़याम भी हिजाब मेरा सुजूद भी हिजाब
तेरी निगाह नाज़ से दोनों मुराद पा गए
अक़्ल ग़ीआब व जुस्तुजू इश्क़ हुज़ूर व इज़्तिराब
तीरा व तार है जहाँ गर्दिश आफ़्ताब से
तब ज़माना ताज़ा कर जलोया बे हिजाब से
तेरी नज़र में हैं तमाम मेरे गज़शता रोज़ व शब
मुझ को ख़बर न थी कि है इल्म नख़ील बे रतब
ताज़ा मिरे ज़मीर में मरकह कुहन हुआ
इश्क़ तमाम मसतफ़ी अक़्ल तमाम बोलहब
गाह बहीला मी बरद गाह बज़ोर मी कशद
इश्क़ की इब्तिदा अजब इश्क़ की इंतिहा अजब
आलम सोज़ व साज़ में वस्ल से बढ़ के है फ़िराक़
वस्ल में मर्ग आरज़ू हिज्र में लज़्ज़त तलब
ऐन विसाल में मुझे होसलह नज़र न था
गरचे बहाना जो रही मेरी निगाह बे अदब
गर्मी आरज़ू फ़िराक़ शोरिश हाए व हो फ़िराक़
!मोज की जुस्तुजू फ़िराक़ क़तरे की आबरू फ़िराक़
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा