गर्म फ़ुग़ाँ है जरस उठ कि गया क़ाफ़िला
!वाये वो रहरो कि है मुंतज़िर राहोला
तेरी तबीअत है और तेरा ज़माना है और
तेरे म्वाफ़क़ नहीं ख़ानक़ही सिलसिला
हो ग़ुलाम ख़िरद या कि इमाम ख़िरद
सालिक रह होशीआर! सख़्त है ये मरहला
उस की ख़ुदी है अभी शाम व में असीर
गर्दिश दौराँ का है जिस की ज़बाँ पर गिला
तेरे नफ़स से हुई आतिश गुल तेज़ तर
मुर्ग़ चमन! है यही तेरी नवा का सिला
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा