ताज़ा फिर दानिश हाज़िर ने क्या क़दीम
गुज़र उस अहद में मुमकिन नहीं बे चोब कलीम
अक़्ल अय्यार है सो भेस बना लेती है
!शक़ बे चारा न मिला है न ज़ाहिद न हकीम
ऐश है ग़रीबान मोहब्बत पे हराम
सब मुसाफ़िर हैं बज़ाहर नज़र आते हैं मक़ीम
है गिराँ सैर ग़म राहला व ज़ाद से तो
कोह व दरिया से गुज़र सकते हैं मानिंद नसीम
मर्द दरवेश का सरमाया है आज़ादी व मर्ग
है किसी और की ख़ातिर ये नसाब ज़र व सीम
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा