!ईह पीरान कलीसा व हरम ऐ वाए मजबूरी
सिला उन की कद्वी काविश का है सीनों की बे नोरी
यक़ीं पैदा कर ऐ नादां! यक़ीं से हाथ आती है
वो दर्वीशी कि जिस के सामने झुकती है फ़ग़फ़ोरी
कभी हैरत कभी मस्ती कभी आह सहरगाही
बदलता है हज़ारों रंग मेरा महजोरी
हद इदराक से बाहर हैं बातें व मस्ती की
समझ में उस क़दर आया कि दिल की मौत है दूरी
वो अपने हुस्न की मस्ती से हैं मजबूर पैदाई
मिरी आँखों की बीनाई में हैं अस्बाब मसतोरी
कोई तक़दीर की मंतिक़ समझ सकता नहीं वर्ना
न थे तरकान असमानी से कम तरकान तीमोरी
फ़क़ीरान हरम के हाथ इक़बाल आगीआ क्यूँकर
मयस्सर मीरो सुल्ताँ को नहीं शाहीन काफ़ोरी
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा