ये कौन ग़ज़ल ख़्वाँ है परसोज़ व नशात अंगेज़
अंदेशा दाना को करता है जुनूँ आमेज़
गो फ़क़्र भी रखता है अंदाज़ मलोकाना
ना पुख़्ता है पर्वीज़ी बे सल्तनत परवेज़
अब हजरा सूफ़ी में वो फ़क़्र नहीं बाक़ी
ख़ून शीरां हो जिस फ़क़्र की दसतावीज़
ऐ हल्क़ा दर्वीशां! वो मर्द कैसा
हो जिस के गरेबाँ में हंगामा रस्ता ख़ेज़
जो ज़िक्र की गर्मी से शोले की तरह रौशन
!जो फ़िक्र की सरत में बिजली से ज़ियादा तेज़
करती है मलोकीत आसार जुनूँ पैदा
अल्लाह के नश्तर हैं तीमोर हो या चनगीज़
यूँ दाद सुख़न मुझ को देते हैं अराक़ व पारस
ये काफ़िर हनदी है बे तेग़ व सिनाँ ख़ूँ रेज़
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा