मता बे बहा है व सोज़ आरज़ू मंदी
मक़ाम बंदगी दे कर न लूँ शान ख़दावनदी
तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया
यहाँ मरने की पाबनदी वहाँ जीने की पाबनदी
हिजाब इक्सीर है आवारा कू मोहब्बत को
मेरी आतिश को भड़काती है तेरी देर पीवनदी
गुज़र औक़ात कर लेता है ये कोह व बयाबाँ में
कि शाहीं के लिए ज़िल्लत है कार आशियाँ बंदी
ये फ़ीज़ान था या कि मकतब की करामत थी
सखाये किस ने असमईल को आदाब फ़रज़नदी
ज़ियारत गाह अहल अज़्म व हिम्मत है लहद मेरी
कि ख़ाक राह को में ने बताया राज़ अलोनदी
मिरी मशातगी की क्या ज़रूरत हुस्न मनी को
कि फ़ितरत ख़ुद बख़ुद करती है लाले की हिना बंदी
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा