ऐ हमाईवं! ज़िंदगी तेरी सरापा सोज़ थी
तेरी चिंगारी अंजुमन अफ़रोज़ थी
गरचे था तेरा तन ख़ाकी नज़ार व दर्दमंद
थी सितारे की तरह रौशन तिरी तब बुलंद
किस क़दर बे बाक उस नात्वां पैकर में था
शोला गर्दूं नवर्द इक मुश्त ख़ाकसतर में था
मौत की लेकिन दिल दाना को कुछ पर्वा नहीं
शब की ख़ामोशी में जुज़ हंगामा फ़र्दा नहीं
मौत को समझे हैं ग़ाफ़िल अख़तताम ज़िंदगी
है ये शाम ज़िंदगी सुब्ह दवाम ज़िंदगी
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा