न सलीक़ा मुझ में कलीम का न क़रीना तुझ में ख़लील का
में हलाक जादोये सामरी तो क़तील शीविया आज़री
में नवा सोख़्ता दर गुलू तो परीदा रंग रमीदा बू
में हिकायत आरज़ू तो हदीस मातम दिलबरी
मिरा ऐश मिरा शहद सम मिरी बूद हम नफ़स अदम
तिरा दिल हरम गरो अजम तिरा दीं ख़रीदा काफ़िरी
दम ज़िंदगी रम ज़िंदगी ग़म ज़िंदगी सम ज़िंदगी
ग़म रम न कर सम ग़म न खा कि यही है शान क़लनदरी
तिरी ख़ाक में है अगर शरर तो ख़याल फ़क़्र व ग़ना न कर
कि जहाँ में नान शईर पर है मदार क़ुव्वत हीदरी
!कोयी ऐसी तर्ज़ तवाफ़ तो मुझे ऐ चराग़ हरम बता
कि तिरे पतंग को फिर अता हो वही सरशत समनदरी
गलह जफ़ाये वफ़ा नुमा कि हरम को अहल हरम से है
किसी बुत कदे में बयाँ करूँ तो कहे सनम भी हरी हरी
न सतीज़ा गाह जहाँ नई न हरीफ़ पनजा फ़गन नए
वही फ़ितरत असद अललही वही मरहबी वही अनतरी
करम ऐ शह अरब व अजम कि खड़े हैं मुंतज़िर करम
वो गदा कि तो ने अता क्या है जनीं दिमाग़ सिकंदरी
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा