तुझे क्यूँ फ़िक्र है ऐ गुल सद चाक बुलबुल की
तो अपने पैरहन के चाक तो पहले रफ़ू कर ले
तमन्ना आबरू की हो अगर गुलज़ार हस्ती में
तो काँटों में उलझ कर ज़िंदगी करने की ख़ू करले
सनोबर बाग़ में आज़ाद भी है पा ब भी है
अनी पाबनदीवं में हासिल आज़ादी को तो कर ले
तुनुक बख़्शी को इस्तिग़्ना से पैग़ाम ख़जालत दे
न रह मिन्नत कश शबनम नगों जाम वसबो कर ले
नहीं ये शान ख़ुद्दारी चमन से तोड़ कर तुझ को
कोई दस्तार में रख ले कोई ज़ेब गुलू कर ले
चमन में ग़ुंचा गुल से ये कह कर उड़ गई शबनम
मज़ाक़ जौर गुलचीं हो तो पैदा रंग व बू कर ले
अगर मंज़ूर हो तुझ को ख़िज़ाँ नाआशना रहना
जहान रंग व बू से पहले क़त आरज़ू कर ले
असी में देख मज़मर है कमाल ज़िंदगी तेरा
जो तुझ को ज़ीनत दामन कोई आईना रो कर ले
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा