ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी तक़दीर है
परदिया मजबूरी व बे चारगी तदबीर है
आसमाँ मजबूर है शम्स व क़मर मजबूर हैं
अंजुम सीमाब पा रफ़्तार पर मजबूर हैं
है शकत अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार में
सब्ज़ा व भी हैं मजबूर नुमू गुलज़ार में
नग़्मा हो या आवाज़ ख़ामोश ज़मीर
है असी ज़ंजीर आलम गीर में हर शय असीर
आँख पर होता है जब ये सर मजबूरी अयाँ
ख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल रवाँ
क़ल्ब अनसानी में रक़्स ऐश व ग़म रहता नहीं
नग़्मा रह जाता है लुत्फ़ ज़ीरोबम रहता नहीं
इल्म व हिकमत रहज़न सामान अश्क व आह है
यानी इक अल्मास का टुकड़ा दिल आगाह है
गरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहीं
आँख मेरी माईह दार अश्क अनाबी नहीं
जानता हूँ आह में आलाम अनसानी का राज़
है नवा शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़
मेरे लब पर क़िस्सा नैरंगी दौराँ नहीं
दिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदाँ नहीं गिर्यां नहीं
पर तिरी तस्वीर क़ासिद गरीह पैहम की है
आह! ये तरदीद मेरी हिकमत मोहकम की है
गिर्या सरशार से बुनियाद जाँ पायनदा है
दर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल सनगदल शर्मिंदा है
मौज दूद आह से आईना है रौशन मिरा
गंज आब आवरद से मामूर है दामन मिरा
हीरती हूँ में तिरी तस्वीर के एजाज़ का
रुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की पर्वाज़ का
रफ़्ता व हाज़िर को गोया पा बपा उस ने क्या
अहद तफ़ली से मुझे फिर आश्ना उस ने क्या
जब तिरे दामन में पलती थी वो जान नात्वां
बात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँ
और अब चरचे हैं जिस की शोख़ी गुफ़्तार के
बे बहा मोती हैं जिस की चश्म गोहरबार के
इल्म की सनजीदा गफ़तारी बढ़ापे का शुऊर
दनीवी अज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूर
ज़िंदगी की औज गाहों से उतर आते हैं हम
सोहबत मादर में तिफ़्ल सादा रह जाते हैं हम
बे तकल्लुफ़ ख़ंदा ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैं
फिर असी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैं
किस को अब होगा वतन में आह! मेरा इंतिज़ार
कौन मेरा ख़त न आने से रहे गा बे क़रार
ख़ाक मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आयों गा
!आब दआये नीम शब में किस को याद में आयों गा
तर्बियत से तेरी में अंजुम का हम क़िस्मत हुआ
घर मिरे अजदाद का सरमाया इज़्ज़त हुआ
दफ़्तर हस्ती में थी ज़रीं वरक़ तेरी हयात
थी सरापा दीं व दुनिया का सबक़ तेरी हयात
उम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़दमत गर रही
में तिरी ख़दमत के क़ाबिल जब हुआ तो चल बसी
वो जवाँ क़ामत में है जो सूरत सर्व बुलंद
तेरी ख़दमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा मंद
कारोबार ज़िंदगानी में वो हम पहलू मिरा
वो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरा
तुझ को मिस्ल तफ़लक बे दस्त व पा रोता है वो
सब्र से नाआशना सुब्ह व मसा रोता है वो
तुख़्म जिस का तो हमारी किश्त जाँ में बू गई
शरकत ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम होगियी
आह! ये दुनिया ये मातम ख़ाना बरना व पीर
!आदमी है किस तिलिस्म दोश व फ़र्दा में असीर
कितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौत
गुलशन हस्ती में मानिंद नसीम अर्ज़ां है मौत
ज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैं
!कीसी कैसी दख़तरान मादर अय्याम हैं
कलबा अफ़लास में दौलत के काशाने में मौत
दश्त व दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौत
मौत है हंगामा आरा क़ुल्ज़ुम ख़ामोश में
डूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश में
ने मजाल शिकवा है ने ताक़त गुफ़्तार है
!ज़नदगानी क्या है इक तौक़ गुलू अफ़शार है
क़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद दरा कुछ भी नहीं
इक मता दीदिया तर के सिवा कुछ भी नहीं
ख़त्म हो जाए गा लेकिन इम्तिहाँ का दूर भी
हैं पस न परदिया गर्दूं अभी और भी
सीना चाक उस गुलिस्ताँ में लाला व गुल हैं तो क्या
नाला व फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्या
झाड़ीआं जिन के क़फ़स में क़ैद है आह ख़िज़ाँ
सब्ज़ कर दे गी अनीं बाद बहार जावदां
ख़ुफ़्ता ख़ाक पय सिपर में है शरार अपना तो क्या
अआरज़ी महमिल है ये मुश्त ग़ुबार अपना तो क्या
ज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकसतर नहीं
टोटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहीं
ज़िंदगी महबूब ऐसी दीदिया क़ुदरत में है
ज़ौक़ हफ़ज़ ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में है
मौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श हयात
आम यूँ उस को न कर देता निज़ाम काएनात
है अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहीं
जिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहीं
आह ग़ाफ़ल! मौत का राज़ निहाँ कुछ और है
नक़्श की नापायदारी से अयाँ कुछ और है
जन्नत नज़ारा है नक़्श हुआ बालाये आब
मौज मुज़्तर तोड़ कर तामीर करती है हबाब
मौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है ये
कितनी बीदरदी से नक़्श अपना मिटा देती है ये
फिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हुआ
तोड़ने में उस के यूँ होती न बे पर्वा हुआ
उस रविश का क्या असर है हेयत तामीर पर
ये तो हजत है हुआ की क़ुव्वत तामीर पर
फ़ितरत हस्ती शहीद आरज़ू रहती न हो
ख़ूब तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न हो
आह सीमाब परेशाँ अंजुम गर्दूं फ़रोज़
शोख़ ये चनगारीआं मम्नून शब है जिन का सोज़
अक़्ल जिस से सर ब ज़ानू है वो मुद्दत उन की है
सरगज़शत नो इंसाँ एक साअत उन की है
फिर ये इंसाँ आँ सू अफ़्लाक है जिस की नज़र
क़ुदसियों से भी मक़ासद में है जो पाकीज़ा तर
जो मिसाल शम्अ रौशन महफ़िल क़ुदरत में है
आसमाँ इक नक़ता जिस की वुसअत फ़ितरत में है
जिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब है
जिस का नाख़ुन साज़ हस्ती के लिए मज़राब है
शोला ये कमतर है गर्दूं के शरारों से भी क्या
कम बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्या
तुख़्म गुल की आँख ज़ेर ख़ाक भी बे ख़्वाब है
किस क़दर नशोवनमा के वास्ते बे ताब है
ज़िंदगी का शोला उस दाने में जो मसतोर है
ख़ुद नुमाई ख़ोदफ़ज़ायी के लिए मजबूर है
सरदी मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहीं
ख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहीं
फूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है ये
मौत से गोया क़बा ज़िंदगी पाता है ये
है लहद उस क़ुव्वत आशुफ़्ता की शीराज़ा बंद
डालती है गर्दन गर्दूं में जो अपनी कमंद
मौत तज्दीद मज़ाक़ ज़िंदगी का नाम है
ख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम है
ख़ोगर पर्वाज़ को पर्वाज़ में डर कुछ नहीं
मौत उस गुलशन में जुज़ सनजीदन पर कुछ नहीं
कहते हैं अहल जहाँ दर्द अजल है ला दवा
ज़ख़्म फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ा
दिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद है
हल्क़ा ज़ंजीर सुब्ह व शाम से आज़ाद है
वक़्त के अफ़्सूँ से थमता नालिया मातम नहीं
वक़्त ज़ख़्म तेग़ फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहीं
सर पे आजाती है जब कोई मुसीबत नागहां
अश्क पैहम दीदिया इंसाँ से होते हैं रवाँ
रब्त हो जाता है दिल को नाला व फ़रियाद से
ख़ून दिल बहता है आँखों की सरिश्क आबाद से
आदमी ताब शकेबाई से गो महरूम है
उस की फ़ितरत में ये इक एहसास नामलोम है
जौहर इंसाँ अदम से आश्ना होता नहीं
आँख से ग़ायब तो होता है फ़ना होता नहीं
रख़्त हस्ती ख़ाक ग़म की शोला अफ़्शानी से है
सर्द ये आग उस लतीफ़ एहसास के पानी से है
आह ये ज़ब्त फ़ुग़ाँ ग़फ़लत की ख़ामोशी नहीं
आगही है ये दिल आसायी फ़रामोशी नहीं
परदिया मशरिक़ से जिस दम जल्वा गर होती है सुब्ह
दाग़ शब का दामन आफ़ाक़ से धोती है सुब्ह
लाला अफ़्सुर्दा को आतिश क़बा करती है ये
बे ज़बाँ ताइर को सरमसत नवा करती है ये
सीना बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद है
सीनकड़ों नग़्मों से बाद सज दम आबाद है
ख़फ़तगान लाला ज़ार व कोहसार व रोदबाद
होते हैं आख़िर उरूस ज़िंदगी से हमकनार
ये अगर आईन हस्ती है कि हो हर शाम सुब्ह
मरक़द इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्ह
दाम सीमीन तख़ील है मिरा आफ़ाक़ गीर
कर लिया है जिस से तेरी याद को में ने असीर
याद से तेरी दिल दर्द आश्ना मामूर है
जैसे काबे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर है
वो फ़रायज़ का तसलसल नाम है जिस का हयात
जल्वा गाहें उस की हैं लाखों जहाँ बे सबात
मख़तलफ़ हर मंज़िल हस्ती की रस्म व राह है
आख़रत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ गाह है
है वहाँ बे हासली किश्त अजल के वास्ते
साज़ गार आब व हुआ तुख़्म अमल के वास्ते
नूर फ़ितरत ज़ुल्मत पैकर का ज़िंदानी नहीं
तंग ऐसा हलक़ह अफ़्कार अनसानी नहीं
ज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबनदा तर
ख़ूब तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़र
मिस्ल अईवान सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरा
नूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिरा
आसमाँ तेरी लहद पर शबनम अफ़्शानी करे
सबज़िया नोरसता उस घर की निगहबानी करे
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा