सतीज़ा कार रहा है अज़ल से ता अमरोज़
मसतफ़्वी से शरार बोलहबी
हयात शोला मिज़ाज व ग़ीवर व शोर अंगेज़
सरशत उस की है मुश्किल कशी तलबी
सुकूत शाम से ता नग़्मा सहर गाही
हज़ार मरहला हाये फ़आन नीम शबी
कुशा कश ज़म व गरमा तप व तराश व ख़राश
ज़ ख़ाक तीरा दरूँ ता ब शीशा हलबी
मक़ाम बसत व शकत व फ़शार व सोज़ व कशीद
मीआन क़तरिया नीसान व आतिश अनबी
असी कशाकश पैहम से ज़िंदा हैं अक़्वाम
यही है राज़ तब व ताब मिल्लत अरबी
मुग़ाँ कि दानह अंगूर आब मी साज़नद
सितारा मी शकननद आफ़्ताब मी साज़नद
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा