इक ये कहने लगे शबनम से सितारे
हर सुब्ह नए तुझ को मयस्सर हैं नज़ारे
क्या जानिए तो कितने जहाँ देख चुकी है
जो बन के मिटे उन के निशाँ देख चुकी है
ज़ोहरा ने सुनी है ये ख़बर एक मुल्क से
इंसानों की बस्ती है बहुत दूर फ़लक से
कह हम से भी उस किश्वर दलकश का
गाता है क़मर जिस की मोहब्बत का तराना
ऐ तारो न पूछो चमनसतान जहाँ की
गुलशन नहीं इक बस्ती है वो आह व फ़ुग़ाँ की
आती है सबा वाँ से पलट जाने की ख़ातिर
बे चारी कली खुलती है मरझाने की ख़ातिर
क्या तुम से कहूँ क्या चमन अफ़रोज़ कली है
नना सा कोई शोला बे सोज़ कली है
गुल नाला बुलबुल की सदा सुन नहीं सकता
दामन से मिरे मोतीवं को चुन नहीं सकता
हैं मुर्ग़ न्वारीज़ गिरफ़्तार ग़ज़ब है
अगते हैं तह साया गुल ख़ार ग़ज़ब है
रहती है सदा नर्गिस बीमार की तर आँख
दिल तालिब नज़ारा है महरूम नज़र आँख
दिल सोख़्ता गर्मी फ़रियाद है शमशाद
ज़िंदानी है और नाम को आज़ाद है शमशाद
तारे शरर आह हैं इंसाँ की ज़बाँ में
में गिर्या गर्दूं हूँ गुलिस्ताँ की ज़बाँ में
नादानी है ये गर्द ज़मीं तौफ़ क़मर का
समझा है कि दरमाँ है वहाँ दाग़ जिगर का
बुनियाद है काशाना आलम की हुआ पर
फ़रियाद की तस्वीर है क़रतास फ़ज़ा पर
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा