या रब! मुस्लिम को वो ज़िंदा तमन्ना दे
जो क़ल्ब को गरमा दे जो रूह को तड़पा दे
फिर वादी फ़ारां के हर ज़र्रे को चमका दे
फिर शौक़ तमाशा दे फिर ज़ौक़ तक़ाज़ा दे
महरूम तमाशा को फिर दीदिया बीना दे
देखा है जो कुछ में ने औरों को भी दिखला दे
भटके हुए आहू को फिर सू हरम ले चल
उस शहर के ख़ोगर को फिर वुसअत सहरा दे
पैदा वीराँ में फिर शोरिश महशर कर
उस महमिल ख़ाली को फिर शाहिद लैला दे
उस दूर की ज़ुल्मत में हर क़ल्ब परेशाँ को
वो दाग़ मोहब्बत दे जो चाँद को शरमा दे
रफ़त में मक़ासद को हमदोश सरीआ कर
ख़ुद्दारी साहिल दे आज़ादी दरिया दे
बे लोस मोहब्बत हो बे बाक सदाक़त हो
सीनों में उजाला कर दिल सूरत मीना दे
एहसास इनायत कर आसार मुसीबत का
अमरोज़ की शोरिश में अनदीशह फ़र्दा दे
में बुलबुल नालाँ हूँ इक उजड़े गुलिस्ताँ का
!तासीर का साइल हूँ महताज को दाता दे
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा