आती है मशरिक़ से जब हंगामा दर दामन
हस्ती से कर जाती है ख़ामोशी सफ़र
महफ़िल क़ुदरत का आख़िर टूट जाता है सुकूत
देती है हर चीज़ अपनी ज़िंदगानी का सुबूत
चहचाते हैं परिंदे पा के पैग़ाम हयात
बाँधते हैं फूल भी गुलशन में एहराम हयात
मुस्लिम ख़्वाबीदा उठ हंगामा आरा तो भी हो
वो चमक उठा उफ़ुक़ गर्म तक़ाज़ा तो भी हो
वुसअत आलम में रह पैमा हो मिस्ल आफ़्ताब
दामन गर्दूं से नापीदा हूँ ये दाग़ सहाब
खींच कर ख़ंजर किरन का फिर हो सरगर्म सतीज़
फिर सिखा तारीकी बातिल को आदाब गुरेज़
तो सरापा नूर है ख़ोशतर है उर्यानी तुझे
और उर्यां हो के लाज़िम है ख़ुद अफ़्शानी तुझे
हाँ नुमायाँ हो के बर्क़ दीदिया ख़फ़ाश हो
ऐ दिल कौन वमकां के राज़ मज़मर! फ़ाश हो
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा