गिराँ जो मुझ पे ये हंगामा ज़माना हुआ
जहाँ से बाँध के रख़्त रवाना हुआ
क़ीवद शाम वसहर में बसर तो की लेकिन
निज़ाम कहना आलम से आश्ना न हुआ
फ़रिश्ते बज़्म रसालत में ले गए मुझ को
हुज़ूर आईह रहमत में ले गए मुझ को
!कहा हुज़ूर ने ऐ अंदलीब बाग़ हिजाज़
कली कली है तिरी गर्मी नवा से गुदाज़
हमेशा सरख़ोश जाम वला है तेरा
फ़तादगी है तिरी ग़ैरत सुजूद नियाज़
उड़ा जो पस्ती दुनिया से तो सू गर्दूं
सिखाई तुझ को मलायक ने रफ़त पर्वाज़
निकल के बाग़ जहाँ से बरनग बू आया
हमारे वास्ते क्या तोहफ़ा ले के तो आया
हज़ोर! दहर में आसोदगी नहीं मिलती
तलाश जिस की है वो ज़िंदगी नहीं मिलती
हज़ारों लाला व गुल हैं रीआज़ हस्ती में
वफ़ा की जिस में हो बू वो कली नहीं मिलती
मगर में नज़्र को इक आबगीना लाया हूँ
जो चीज़ उस में है जन्नत में भी नहीं मिलती
झलकती है तिरी उम्मत की आबरू उस में
तराबलस के शहीदों का है लहू उस में
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा