दोश मी गफ़तम ब शम्अ वीरान ख़्वीश
गीस्वे तो अज़ पर दारद शाना ऐ
दरजहां मिस्ल चराग़ लाला सहरासतम
ने नसीब महफ़ले ने क़िस्मत काशाना ऐ
मदते मानिंद तो मन हम नफ़स मी सोख़तम
दर तवाफ़ शोला अम बाले न ज़द परवाना ऐ
मी तपद सद जल्वा दर जान अमल फ़रसोदम न
बर नमी ख़ीज़द अज़ीं महफ़िल दिल दीवाना ऐ
अज़ कुजा अईं आतिश आलम फ़रोज़ अनदोख़ती
करमक बे माईह रा सोज़ कलीम आमोख़ती
मुझ को जो मौज नफ़स देती है पैग़ाम अजल
लब असी मौज नफ़स से है नवा पीरा तिरा
में तो जलती हूँ कि है मज़मर मिरी फ़ितरत में सोज़
तो फ़रोज़ाँ है कि परवानों को हो सौदा तिरा
गिर्या सामाँ में कि मेरे दिल में है तूफ़ान अश्क
शबनम अफ़्शाँ तो कि बज़्म गुल में हो चर्चा तिरा
गुल ब दामन है मिरी शब के लहू से मेरी सुब्ह
है तिरे अमरोज़ से ना आश्ना फ़र्दा तिरा
यूँ तो रौशन है मगर सोज़ दरूँ रखता नहीं
शोला है मिस्ल चराग़ लालह सहरा तिरा
सोच तो दिल में लक़ब साक़ी का है ज़ीबा तुझे
!आनजमन प्यासी है और पैमाना बे सहबा तिरा
और है तेरा शिआर आईन मिल्लत और है
ज़शत रूई से तिरी आईना है रुस्वा तिरा
काबा पहलू में है और सौदाई बुत ख़ाना है
किस क़दर शोरीदा सर है शौक़ बे पर्वा तिरा
क़ैस पैदा हूँ तिरी महफ़िल में ये मुमकिन नहीं
तंग है सहरा तिरा महमिल है बे लैला तिरा
!आए दर ताबनदा ऐ परोरदह आग़ोश मौज
लज़्ज़त तूफ़ाँ से है ना आश्ना दरिया तिरा
अब नवा पीरा है क्या गुलशन हुआ बरहम तिरा
बे महल तेरा तरनम नग़्मा बे मौसम तिरा
था जनीं ज़ौक़ तमाशा वो तो रुख़्सत हो गए
ले के अब तो वादा दीदार आम आया तो क्या
अंजुमन से वो पुराने शोला आशाम उठ गए
साक़ीआ! महफ़िल में तो आतिश बजाम आया तो क्या
आह जब गुलशन की जमइय्यत परेशाँ हो चुकी
फूल को बाद बहारी का पयाम आया तो क्या
आख़िर शब दीद के क़ाबिल थी बिस्मिल की तड़प
सबहदम कोई अगर बालाये बाम आया तो क्या
बुझ गया वो शोला जो मक़्सूद हर परवाना था
अब कोई सौदाई सोज़ तमाम आया तो क्या
फूल बे पर्वा हैं तो गर्म नवा हो या न हो
कारवाँ बे हस है आवाज़ दरा हो या न हो
शम्अ महफ़िल हो के तो जब सोज़ से ख़ाली रहा
तेरे परवाने भी उस लज़्ज़त से बेगाने रहे
रिश्ता उल्फ़त में जब उन को परो सकता था तो
फिर परेशाँ क्यूँ तिरी तस्बीह के दाने रहे
शौक़ बे पर्वा गया फ़िक्र फ़लक पैमा गया
तेरी महफ़िल में न दीवाने न फ़रज़ाने रहे
वो जिगर सोज़ी नहीं वो शोला आशामी नहीं
फ़ाएदा फिर क्या जो गर्द शम्अ परवाने रहे
ख़ैर तो साक़ी सही लेकिन पिलाए गा किसे
अब न वो मय कश रहे बाक़ी न मय ख़ाने रहे
रो रही है आज इक टूटी हुई मीना उसे
कल तलक गर्दिश में जिस साक़ी के पैमाने रहे
आज हैं ख़ामोश वो दश्त जुनूँ परवर जहाँ
रक़्स में लैला रही लैला के दीवाने रहे
वाए नाकामी! मता कारवाँ जाता रहा
कारवाँ के दिल से एहसास ज़ियाँ जाता रहा
जिन के हनगामों से थे आबाद वीराने कभी
शहर उन के मिट गए आबादीआं बन हो गईं
सतवत तोहीद क़ायम जिन नमाज़ों से हुई
वो नमाज़ीं हिन्द में नज़्र बरहमन हो गईं
दहर में ऐश दवाम आएँ की पाबनदी से है
मौज को आज़ादीआं सामान शेवन हो गईं
ख़ुद तजल्ली को तमन्ना जिन के नज़ारों की थी
वो निगाहें ना अमीद नूर अईमन होगियीं
उड़ती फिरती थीं हज़ारों बलबलीं गुलज़ार में
दिल में क्या आई कि पाबंद नशेमन हो गईं
वुसअत गर्दूं में थी उन की तड़प नज़ारा सोज़
बिजलियाँ आसोदह दामान ख़िर्मन होगियीं
दीदह ख़ोनबार हो मिन्नत कश गुलज़ार क्यूँ
अश्क पैहम से निगाहें गुल ब दामन हो गईं
शाम ग़म लेकिन ख़बर देती है सुब्ह ईद की
ज़ुल्मत शब में नज़र आई किरन अमीद की
!मज़दा ऐ पैमाना बरदार ख़मसतान हिजाज़
बाद मुद्दत के तिरे रिंदों को फिर आया है होश
नक़्द ख़ुद्दारी बहा बादह अग़्यार थी
फिर दुकाँ तेरी है लबरेज़ सदा नायो नोश
टूटने को है तिलिस्म माह सीमाईआन हिन्द
फिर सलीमी की नज़र देती है पैग़ाम ख़रोश
फिर ये ग़ोग़ा है कि लासाक़ी शराब ख़ाना साज़
दिल के हंगामे मे मग़रिब ने कर डाले ख़मोश
नग़्मा पीरा हो कि ये हंगाम ख़ामोशी नहीं
है सहर का आसमाँ ख़ुर्शीद से मीना बदोश
दर ग़म दीगर बसोज़ व दीगरां रा हम बसोज़
गफ़तमत रौशन हदीसे गर त्वानी दार गोश
कह गए हैं शाइरी जुज़्व यसत अज़ पीग़मबरी
हाँ सुना दे महफ़िल मिल्लत को पैग़ाम सरोश
आँख को बेदार कर दे वादा दीदार से
ज़िंदा कर दे दिल को सोज़ जौहर गुफ़्तार से
रहज़न हिम्मत हुआ ज़ौक़ तन आसानी तिरा
बहर था सहरा में तो गुलशन में मिस्ल जो हुआ
अपनी असलीत पे क़ायम था तो जमइय्यत भी थी
छोड़ कर गुल को परेशाँ कारवान बू हुआ
ज़िंदगी क़तरे की सखलाती है असरार हयात
ये कभी गौहर कभी शबनम कभी आँसू हुआ
फिर कहीं से उस को पैदा कर बड़ी दौलत है ये
ज़िंदगी कैसी जो दिल बीगानह पहलू हुआ
फ़र्द क़ायम रब्त मिल्लत से है तन्हा कुछ नहीं
मौज है दरिया में और बैरून दरिया कुछ नहीं
पर्दा दिल में मोहब्बत को अभी मसतोर रख
आबर बाक़ी तिरी मिल्लत की जमीत है थी
जब ये जमीत गई दुनिया में रुस्वा तो हुआ
यानी अपनी मय को रुस्वा सूरत मीना न कर
ख़ीमा ज़न हो वादी सीना में मानिंद कलीम
शोला तहक़ीक़ को ग़ारत गर काशाना कर
शम्अ को भी हो ज़रा मालूम अंजाम सितम
सिर्फ़ तामीर सहर ख़ाकसतर परवाना कर
तो अगर ख़ुद दार है मिन्नत कश साक़ी न हो
ऐन दरिया में हबाब आसा नगों पैमाना कर
कैफ़ियत बाक़ी पुराने कोह व सहरा में नहीं
है जुनूँ तेरा नया पैदा नया वीराना कर
ख़ाक में तुझ को मुक़द्दर ने मिलाया है अगर
तो असा अफ़ताद से पैदा मिसाल दाना कर
हाँ असी शाख़ कुहन पर फिर बना ले आशियाँ
अहल गुलशन को शहीद नग़्मा मस्ताना कर
उस चमन में पीरो बुलबुल हो या तलमीज़ गुल
या सरापा नाला बन जा या नवा पैदा न कर
क्यूँ चमन में बे सदा मिस्ल रम शबनम है तो
लब कुशा हो जा सरोद बरबत आलम है तो
आश्ना अपनी हक़ीक़त से हो ऐ दहक़ाँ ज़रा
दाना तो खीती भी तो बारां भी तो हासिल भी तो
आह किस की जुस्तुजू आवारा रखती है तुझे
राह तो रहरो भी तो रहबर भी तो मंज़िल भी तो
कानपता है दिल तिरा अनदीशह तूफ़ाँ से क्या
नाख़ुदा तो बहर तो कश्ती भी तो साहिल भी तो
देख आ कर कोचह चाक गरेबाँ में कभी
क़ैस तो लैला भी तो सहरा भी तो महमिल भी तो
वाए नादानी कि तो महताज साक़ी हो गया
मय भी तो मीना भी तो साक़ी भी तो महफ़िल भी तो
शोला बन कर फूँक दे ख़ाशाक ग़ैर अल्लाह को
ख़ौफ़ बातिल क्या कि है ग़ारत गर बातिल भी तो
बे ख़बर! तो जौहर आयीनह अय्याम है
तो ज़माने में ख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है
अपनी असलीत से हो आगाह ऐ ग़ाफ़िल कि तो
क़तरा है लेकिन मिसाल बहर बे पाईआं भी है
क्यूँ गिरफ़्तार तिलिस्म हेच मक़दारी है तो
देख तो पोशीदा तुझ में शौकत तूफ़ाँ भी है
सीना है तेरा अमीं उस के पयाम नाज़ का
जो निज़ाम दहर में पैदा भी है पिन्हाँ भी है
हफ़्त किश्वर जिस से हो तस्ख़ीर बे तेग़ व तफ़नग
तो अगर समझे तो तेरे पास वो सामाँ भी है
अब तलक शाहिद है जिस पर कोह फ़ारां का सुकूत
ऐ तग़ाफ़ुल पीशह! तुझ को याद वो पैमाँ भी है
तो ही नादाँ चंद कलियों पर क़नाअत कर गया
वर्ना गुलशन में इलाज तंगी दामाँ भी है
दिल की कैफ़ियत है पैदा परदह तक़रीर में
कसोत मीना में मय मसतोर भी उर्यां भी है
फूँक डाला है मिरी आतिश नवाई ने मुझे
अवरमीरी ज़िंदगानी का यही सामाँ भी है
राज़ उस आतिश नवाई का मिरे सीने में देख
!जलोह तक़दीर मेरे दिल के आईने में देख
आसमाँ होगा सहर के नूर से आईना पोश
और ज़ुल्मत रात की सीमाब पा हो जाए गी
उस क़दर होगी तरनम आफ़रीं बाद बहार
निकहत ख़्वाबीदा ग़ुंचे की नवा हो जाए गी
आमलीं गे सीना चाकान चमन से सीना चाक
बज़्म गुल की हम नफ़स बाद सबा हो जाए गी
शबनम अफ़्शानी मिरी पैदा करे गी सोज़ व साज़
उस चमन की हर कली दर्द आश्ना हो जाए गी
देख लो गे सतवत रफ़्तार दरिया का मआल
मौज मुज़्तर ही उसे ज़ंजीर पा हो जाए गी
फिर दिलों को याद आ जाए गा पैग़ाम सुजूद
फिर जबीं ख़ाक हरम से आश्ना हो जाए गी
नालह सय्याद से हूँ गे नवा सामाँ तीवर
ख़ून गुलचीं से कली रंगीं क़बा हो जाए गी
आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं
महव हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाए गी
शब गुरेज़ाँ हो गी आख़िर जल्वा ख़ुर्शीद से
ये चमन मामूर होगा नग़्मा तोहीद से
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा