कभी ऐ नौजवाँ मसलम! तदबर भी क्या तो ने
वो क्या गर्दूं था तो जिस का है इक टूटा हुआ तारा
तुझे उस क़ौम ने पाला है आग़ोश मोहब्बत में
कचल डाला था जिस ने पायों में ताज सर दारा
तमदन आफ़रीं ख़लाक़ आईन जहाँ दारी
वो सहरा अरब यानी शतरबानों का गह्वारा
समाँ अलफ़क़र फ़ख़री का रहा शान अमारत में
बाब व रंग व ख़ाल व ख़त चा हाजत र्वे ज़ीबा रा
गदाई में भी वो अल्लाह वाले थे ग़ीवर इतने
कि मुनइम को गदा के डर से बख़्शिश का न था यारा
ग़रज़ में क्या कहूँ तुझ से कि वो सहरा नशीं क्या थे
जहाँ गीर व जहाँ दार व जहाँ बान व जहाँ आरा
अगर चाहूँ तो नक़्शा खींच कर अल्फ़ाज़ में रख दूँ
मगर तेरे तख़ील से फ़ुज़ूँ तर है वो नज़ारा
तुझे आबा से अपने कोई निस्बत हो नहीं सकती
कि तो गुफ़्तार वो किरदार तो साबित वो सेआरा
गँवा दी हम ने जो असलाफ़ से मीरास पाई थी
सरीआ से ज़मीं पर आसमाँ ने हम को दे मारा
हुकूमत का तो क्या रोना कि वो इक अआरज़ी शय थी
नहीं दुनिया के आईन मुस्लिम से कोई चारा
मगर वो इल्म के मोती किताबें अपने आबा की
जो देखें उन को योरप में तो होता है सीपारा
ग़नी! रोज़ सियाह पीर कनआँ रा तमाशा किन
कि दीदा अश रौशन कनद चश्म ज़ुलेख़ा रा
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा