चमनसतां के ज़ीबा हूँ कि नाज़ीबा
महरूम अमल नर्गिस मजबूर तमाशा है
रफ़्तार की लज़्ज़त का एहसास नहीं उस को
ही सनोबर की महरूम तमन्ना है
तस्लीम की ख़ोगर है जो चीज़ है दुनिया में
इंसान की हर क़ुव्वत सरगर्म तक़ाज़ा है
उस ज़र्रे को रहती है वुसअत की हवस हर दम
ये ज़र्रा नहीं शायद सिमटा हुआ सहरा है
चाहे तो बदल डाले हेयत चमनसतां की
ये हस्ती दाना है बीना है त्वाना है
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा