चैन व अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारा
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा
तोहीद की अमानत सीनों में है हमारे
आसाँ नहीं मटाना नाम व निशाँ हमारा
दुनिया के बुत कदों में पहला वो घर का
हम उस के पासबाँ हैं वो पासबाँ हमारा
तीग़ों के साए में हम पल कर जवाँ हुए हैं
ख़ंजर हिलाल का है क़ौमी निशाँ हमारा
मग़रिब की वादीवं में गूँजी अज़ाँ हमारी
थमता न था किसी से सैल रवाँ हमारा
बातिल से दनबे वाले ऐ आसमाँ नहीं हम
सो बार कर चुका है तो इम्तिहाँ हमारा
ऐ गलसतान अनदलस! वो दिन हैं याद तुझ को
था तेरी डालीवं पर जब आशियाँ हमारा
ऐ मौज दजलह! तो भी पहचानती है हम को
अब तक है तेरा दरिया अफ़्साना ख़्वाँ हमारा
ऐ अर्ज़ पाक! तेरी हुरमत पे कट मिरे हम
है ख़ूँ तिरी रगों में अब तक रवाँ हमारा
सालार है मीर हिजाज़ अपना
उस नाम से है बाक़ी आराम जाँ हमारा
इक़बाल का तराना बानग दरा है गोया
होता है जादा पैमा फिर कारवाँ हमारा
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा