वो मस्त नाज़ जो गुलशन में जा निकलती है
कली कली की ज़बाँ से निकलती है
अलही! फूलों में वो इंतिख़ाब मुझ को करे
कली से रश्क आफ़्ताब मुझ को करे
तुझे वो शाख़ से तोड़ीं! ज़हे नसीब तिरे
तड़पते रह गए गुलज़ार में रक़ीब तिरे
उठा के सदमा फ़ुर्क़त विसाल तक पहुँचा
तिरी हयात का जौहर कमाल तक पहुँचा
मिरा कँवल कि तसदक़ हैं जिस पे अहल नज़र
मिरे शबाब के गुलशन को नाज़ है जिस पर
कभी ये फूल हम आग़ोश मुद्दआ न हुआ
किसी के दामन रंगीं से आश्ना न हुआ
शगुफ़्ता कर न सके गी कभी बहार उसे
फ़सुर्दा रखता है गुलचीं का इंतिज़ार उसे
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा