उठ कि ज़ुल्मत हुई पैदा उफ़ुक़ ख़ावर पर
बज़्म में शोला नवाई से उजाला कर दीं
एक फ़रियाद है मानिंद सिपंद अपनी बिसात
असी हंगामे से महफ़िल तह व बाला कर दीं
अहल महफ़िल को दिखा दीं असर सैक़ल
संग अमरोज़ को आईना फ़र्दा कर दीं
जल्वा यूसुफ़ गुम गश्ता दिखा कर उन को
तपिश आमादा तर अज़ ख़ून ज़ुलेख़ा कर दीं
उस को सबक़ आईन नुमू का दे कर
क़तरा शबनम बे माईह को दरिया कर दीं
रख़्त जाँ बुत कदह चीं से उठा लें अपना
सब को महव रुख़ सदी व सलीमी कर दीं
दीख! यसरब में हुआ नाक़ा लैला बीकार
क़ैस को आरज़ू नौ से शनासा कर दीं
बादा देरीना हो और गर्म हो ऐसा कि गुदाज़
जिगर शीशा व पैमाना व मीना कर दीं
गर्म रखता था हमें सरदी मग़रिब में जो दाग़
चीर कर सीना उसे वक़्फ़ तमाशा कर दीं
शम्अ की तरह जीईं बज़्म गह आलम में
ख़ुद जलीं दीदा अग़्यार को बीना कर दीं
हर चा दर दिल गज़रद वक़्फ़ ज़बाँ दारद शम्अ
सोख़्तन नीसत ख़ीआले कि निहाँ दारद शम्अ
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा