ख़ामोश है चाँदनी क़मर की
शाख़ें हैं ख़मोश हर शजर की
वादी के नवा फ़रोश ख़ामोश
कोहसार के सब्ज़ पोश ख़ामोश
फ़ितरत बे होश हो गई है
आग़ोश में के सो गई है
कुछ ऐसा सुकूत का फ़ुसूँ है
नीकर का ख़िराम भी सकों है
तारों का ख़मोश कारवाँ है
ये क़ाफ़िला बे दरा रवाँ है
ख़ामोश हैं कोह व दश्त व दरिया
क़ुदरत है मराक़बे में गोया
ऐ दल! तो भी ख़मोश हो जा
आग़ोश में को ले के सो जा
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा