ने कर दिया तुझे ज़ौक़ तपिश से आश्ना
बज़्म को मिस्ल शम्अ बज़्म हासिल सोज़ व साज़ दे
शान करम पे है मदार इश्क़ गिरह कशाए का
देर व हरम की क़ैद कीआ! जिस को वो बे नियाज़ दे
सूरत शम्अ नूर की मिलती नहीं क़बा उसे
जिस को न दहर में गिर्या-ए जाँ गुदाज़ दे
तारे में वो क़मर में वो जल्वा गह सहर में वो
चश्म नज़ारा में न तो सुर्मा-ए इम्तियाज़ दे
इश्क़ बुलंद बाल है रस्म व रह नियाज़ से
हुस्न है मस्त नाज़ अगर तो भी जवाब नाज़ दे
पीर मग़ां! फ़रंग की मय का नशात है असर
उस में वो कैफ़ ग़म नहीं मुझ को तो ख़ाना साज़ दे
तुझ को ख़बर नहीं है कीआ! बज़्म कुहन बदल गई
अब न ख़ुदा के वास्ते उन को मी मजाज़ दे
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा