ठी फिर आज वो पोरब से काली काली घटा
सियाह पोश हुआ फिर पहाड़ सरबन का
निहाँ हुआ जो रुख़ मेहर ज़ेर दामन अब्र
हवा सर्द भी आई सवार तौसन अब्र
गरज का शोर नहीं है ख़मोश है ये घटा
अजीब मय कदिया बे ख़रोश है ये घटा
में हुक्म नशात मुदाम लाई है
क़बा में गुहर टानकने को आई है
जो फूल मेहर की गर्मी से सो चले थे अठे
ज़मीं की गोद में जो पड़ के सो रहे थे अठे
हुआ के ज़ोर से अभरा बढ़ा उड़ा बादल
अठी वो और घटा लो! बरस पड़ा बादल
अजीब ख़ीमा है कोहसार के नहालों का
यहीं क़याम हो वादी में फिरने वालों का
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा