रुख़्सत ऐ बज़्म जहां! सू वतन जाता हूँ में
आह! उस आबाद वीराने में घबराता हूँ में
बसका में अफ़्सुर्दा हूँ दरख़ोर महफ़िल नहीं
तो मिरे क़ाबिल नहीं है में तिरे क़ाबिल नहीं
क़ैद है दरबार सलतान व शबसतान वज़ीर
तोड़ कर निकले गा ज़ंजीर तलायी का असीर
गो बड़ी लज़्ज़त तिरी हंगामा आराई में है
अजनबीत सी मगर तेरी शनासाई में है
मुद्दतों तेरे ख़ुद आरायों से हम सोहबत रहा
मुद्दतों बे ताब मौज बहर की सूरत रहा
मुद्दतों बैठा तिरे हंगामा इशरत में में
रौशनी की जुस्तुजू करता रहा ज़ुल्मत में में
मुद्दतों ढूँडा क्या नज़ारिया ख़ार में
आह वो यूसुफ़ न हाथ आया तिरे बाज़ार में
चश्म हैराँ ढोनडती अब और नज़ारे को है
आरज़ू साहिल की मुझ तूफ़ान के मारे को है
छोड़ कर मानिंद बू तेरा चमन जाता हूँ में
रुख़्सत ऐ बज़्म जहां! सू वतन जाता हूँ में
घर बनाया है सुकूत दामन कोहसार में
आह! ये लज़्ज़त कहाँ मोसीक़ी गुफ़्तार में
हम नशीन नर्गिस शहला रफ़ीक़ गुल हूँ में
है चमन मेरा वतन हमसाईह बुलबुल हूँ में
शाम को आवाज़ चश्मों की सलाती है मुझे
सुब्ह फ़र्श सब्ज़ से कोयल जगाती है मुझे
बज़्म हस्ती में है सब को महफ़िल आराई पसंद
है दिल शाइर को लेकिन कुंज तन्हाई पसंद
है जुनूँ मुझ को कि घबराता हूँ आबादी में में
ढूँडता फिरता हूँ किस को कोह की वादी में में
शौक़ किस का सब्ज़ा ज़ारों में फराता है मुझे
और चश्मों के किनारे पर सलाता है मुझे
ताना ज़न है तो कि शैदा कुंज उज़्लत का हूँ में
देख ऐ ग़ाफ़ल! पयामी बज़्म क़ुदरत का हूँ में
हम वतन शमशाद का क़ुमरी का में हम राज़ हूँ
उस चमन की ख़ामुशी में गोश बर आवाज़ हूँ
कुछ जो सुनता हूँ तो औरों को सुनाने के लिए
देखता हूँ कुछ तो औरों को दुखाने के लिए
आशिक़ उज़्लत है दिल नाज़ाँ हूँ अपने घर पे में
ख़ंदा ज़न हूँ मसनद दारा व असकनदर पे में
लीटना ज़ेर शजर रखता है जादू का असर
शाम के तारे पे जब पड़ती हो रह रह कर नज़र
!लम के हैरत कदे में है कहाँ उस की नुमूद
गुल की पती में नज़र आता है राज़ हसत व बूद
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा