अक़्ल ने एक दिन ये से कहा
भूले भटके की रहनुमा हूँ में
हूँ ज़मीं पर गुज़र फ़लक पे मिरा
देख तो किस क़दर रसा हूँ में
काम दुनिया में रहबरी है मिरा
मिस्ल ख़िज़्र ख़जसता पा हूँ में
हूँ मफ़सर किताब हस्ती की
मज़हर शान कबरीआ हूँ में
बूँद इक ख़ून की है तो लेकिन
ग़ैरत लाल बे बहा हूँ में
ने सुन कर कहा ये सब सच है
पर मुझे भी तो देख क्या हूँ में
राज़ हस्ती को तो समझती है
और आँखों से देखता हूँ में
है तुझे वास्ता मज़ाहर से
और बातिन से आश्ना हूँ में
इल्म तुझ से तो मरफ़त मुझ से
तो ख़ुदा जो ख़ुदा नुमा हूँ में
इल्म की इंतिहा है बे ताबी
उस मरज़ की मगर दवा हूँ में
शम्अ तो महफ़िल सदाक़त की
हुस्न की बज़्म का दिया हूँ में
तो ज़मान व मकाँ से रिश्ता बपा
ताइर सदरा आश्ना हूँ में
किस बुलंदी पे है मक़ाम मिरा
!रश रब जलील का हूँ में
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
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जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा