में सोई जो इक तो देखा ये ख़्वाब
बढ़ा और जिस से मिरा इज़्तिराब
ये देखा कि में जा रही हूँ कहीं
अनधीरा है और मिलती नहीं
लरज़ता था डर से मिरा बाल बाल
क़दम का था दहशत से अठना मुहाल
जो कुछ हौसला पा के आगे बढ़ी
तो देखा क़तार एक लड़कों की थी
ज़मुर्रद सी पोशाक पहने हुए
दिए सब के हाथों में जलते हुए
वो चुप चाप थे आगे पीछे रवाँ
ख़ुदा जाने जाना था उन को कहाँ
असी सोच में थी कि मेरा पसर
मुझे उस जमात में आया नज़र
वो पीछे था और तेज़ चलता न था
दिया उस के हाथों में जलता न था
!कहा में ने पहचान कर मेरी जाँ
!मझे छोड़ कर आ गए तुम कहाँ
जुदाई में रहती हूँ में बे क़रार
परोती हूँ हर रोज़ अश्कों के हार
न पर्वा हमारी ज़रा तुम ने की
गए छोड़ अच्छी वफ़ा तुम ने की
जो बच्चे ने देखा मिरा पेच व ताब
दिया उस ने मुँह फेर कर यूँ जवाब
रलाती है तुझ को जुदाई मिरी
नहीं उस में कुछ भी भलायी मिरी
ये कह कर वो कुछ देर तक चुप रहा
दिया फिर दिखा कर ये कहने लगा
समझती है तो हो गया क्या उसे
तिरे आनसोयों ने बझाईआ उसे
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
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न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
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