कारगाह हस्ती में लाला दाग़ सामाँ है
बर्क़ ख़िर्मन राहत ख़ून गर्म दहक़ाँ है
ग़ुंचा ता शगुफ़्तन हा बर्ग आफ़ियत मालूम
बावजूद जमई ख़्वाब गुल परेशाँ है
हम से रंज बेताबी किस तरह उठाया जाए
दाग़ पुश्त दस्त इज्ज़ शोला ख़स ब दंदाँ है
के तग़ाफ़ुल से हर्ज़ा गर्द है आलम
रू शश जिहत आफ़ाक़ पुश्त चश्म ज़िंदाँ है
हैरत तपीदन हा ख़ूँ बहा दीदन हा
रंग गुल के पर्दे में आईना पर अफ़्शाँ है
वहशत अंजुमन है गुल देख लाले का आलम
मिस्ल दूद मजमर के दाग़ बाल अफ़्शाँ है
ऐ करम न हो ग़ाफ़िल वर्ना है असद बीदल
बे घर सदफ़ गोया पुश्त चश्म नीसां है
Responses
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कशाकश हा हस्ती से करे क्या सई आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज आब को फ़ुर्सत रवानी की
नश्शा हा शादाब रंग व साज़ हा मस्त तरब
शीशा-ए मय सर्व सब्ज़ जोयबार नग़्मा है
वफ़ा दलबरां है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना ऐ हमदम
असर फ़रियाद दिल हा हज़ीं का किस ने देखा है
ब सख़्ती हा क़ैद ज़िंदगी मालूम आज़ादी
शरर भी सैद दाम रिश्ता-ए रग हा ख़ारा है
तसव्वुर बहर तस्कीन तपीदन हा तिफ़्ल दिल
ब बाग़ रंग हा रफ़्ता गुल चैन तमाशा है
बजा है गर न सुने नाला हाये बुलबुल ज़ार
कि गोश गुल नम शबनम से पनबा आगीं है